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Saturday, July 11, 2015

द्रोपदी के पांच पति थे या एक ?

about draupadi and pandavas
द्रोपदी के पांच पति थे या एक: क्या कहती है महाभारत?

द्रोपदी महाभारत की एक आदर्श पात्र है। लेकिन द्रोपदी जैसी विदुषी नारी के साथ हमने बहुत अन्याय किया है। सुनी सुनाई बातों के आधार पर हमने उस पर कई ऐसे लांछन लगाये हैं जिससे वह अत्यंत पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट नारी सिद्घ होती है। एक ओर धर्मराज युधिष्ठर जैसा परमज्ञानी उसका पति है, जिसके गुणगान करने में हमने कमी नही छोड़ी। लेकिन द्रोपदी पर अतार्किक आरोप लगाने में भी हम पीछे नही रहे।

द्रोपदी पर एक आरोप है कि उसके पांच पति थे। हमने यह आरोप महाभारत की साक्षी के आधार पर नही बल्कि सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर लगा दिया। बड़ा दु:ख होता है जब कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इस आरोप को अपने लेख में या भाषण में दोहराता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्घि पर तरस आता है, और मैं सोचा करता हूं कि ये लोग अध्ययन के अभाव में ऐसा बोल रहे हैं, पर इन्हें यह नही पता कि ये भारतीय संस्कृति का कितना अहित कर रहे हैं।

आईए महाभारत की साक्षियों पर विचार करें! जिससे हमारी शंका का समाधान हो सके कि द्रोपदी के पांच पति थे या एक, और यदि एक था तो फिर वह कौन था?

जिस समय द्रोपदी का स्वयंवर हो रहा था उस समय पांडव अपना वनवास काट रहे थे। ये लोग एक कुम्हार के घर में रह रहे थे और भिक्षाटन के माध्यम से अपना जीवन यापन करते थे, तभी द्रोपदी के स्वयंवर की सूचना उन्हें मिली। स्वयंवर की शर्त को अर्जुन ने पूर्ण किया। स्वयंवर की शर्त पूरी होने पर द्रोपदी को उसके पिता द्रुपद ने पांडवों को भारी मन से सौंप दिया। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह किसी पांडु पुत्र के साथ हो, क्योंकि उनकी राजा पांडु से गहरी मित्रता रही थी। राजा दु्रपद पंडितों के भेष में छुपे हुए पांडवों को पहचान नही पाए, इसलिए उन्हें यह चिंता सता रही थी कि आज बेटी का विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नही हो पाया। पांडव द्रोपदी के साथ अपनी माता कुंती के पास पहुंच गये।
माता कुंती ने क्या कहा

पांडु पुत्र भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने प्रतिदिन की भांति अपनी भिक्षा को लाकर उस सायंकाल में भी अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठर को निवेदन की। तब उदार हृदया कुंती माता द्रोपदी से कहा-’भद्रे! तुम भोजन का प्रथम भाग लेकर उससे बलिवैश्वदेवयज्ञ करो तथा ब्राहमणों को भिक्षा दो। अपने आसपास जो दूसरे मनुष्य आश्रित भाव से रहते हैं उन्हें भी अन्न परोसो। फिर जो शेष बचे उसका आधा हिस्सा भीमसेन के लिए रखो। पुन: शेष के छह भाग करके चार भाईयों के लिए चार भाग पृथक-पृथक रख दो, तत्पश्चात मेरे और अपने लिए भी एक-एक भाग अलग-अलग परोस दो। उनकी माता कहती हैं कि कल्याणि! ये जो गजराज के समान शरीर वाले, हष्ट-पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं इनका नाम भीम है, इन्हें अन्न का आधा भाग दे दो क्योंकि यह वीर सदा से ही बहुत खाने वाले हैं।

महाभारत की इस साक्षी से स्पष्ट है कि माता कुंती से पांडवों ने ऐसा नही कहा था कि आज हम तुम्हारे लिए बहुत अच्छी भिक्षा लाए हैं और न ही माता कुंती ने उस भिक्षा को (द्रोपदी को) अनजाने में ही बांट कर खाने की बात कही थी। माता कुंती विदुषी महिला थीं, उन्हें द्रोपदी को अपनी पुत्रवधु के रूप में पाकर पहले ही प्रसन्नता हो चुकी थी।
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क्या रावण जगद्जननी मां जानकी का हरण कर सकता था?

about sita haran
बहुत दिन से इस विषयपर लिखने का सोच रहा था, जिसकी कई वजहें थी कुछ मूर्खों और अधर्मियों द्वारा माता सीता के बारे में निंदनीय बात कहना तथा मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के बारे में निराधार बातें कहना...

ये उन मूर्खों के लिए प्रत्युत्तर है.. जिन्होंने रामायण या रामचरित मानस का पठन तो क्या ढंग से रामायण सीरियल भी नहीं देखा और बातें ब्रहम की करते हैं... साथ ही अश्लील बातें करने वाले तथाकथित शांति के धर्म वालों के लिए भी सादर जानकारी है. जिनके लिए सो कॉल्ड खुदा की पुस्तक ही अंतिम सत्य है, बाकी सब मिथ्या॥

तथा ये जानकारी अपने हिंदु भाइयों के ज्ञानवर्धन के लिए भी सादर प्रस्तुत है.

 अब बात करते हैं सिया-हरण की। सीता हरण तो बहुत दूर की बात है, उन जैसी पतिव्रता नारी को छूना तक असम्भव था। उनके सतीत्व में इतना बल था कि अगर कोई भी उनको स्पर्श तक करता तो तत्काल भस्म हो जाता। रावण ने जिनका हरण किया वो वास्तविक माता सीता ना होकर उनकी प्रतिकृति छाया मात्र थी। इसके पीछे एक गूढ रहस्य है, जिसका महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण व गोस्वामी तुलसी कृत रामचरित मानस में स्पष्ट वर्णन है... पंचवटी पर निवास के समय जब श्री लक्ष्मण वन में लकडी लेने गये थे तो प्रभु श्री

राम ने माता जानकी से कहा-
"तब तक करो अग्नि में वासा।
जब तक करुं निशाचर नाशा॥"
प्रभु जानते थे कि रावण अब आने वाला है, इसलिए उन्होंने कहा- हे सीते अब वक्त आ गया है, तुम एक वर्ष तक अग्नि में निवास करो, तब तक मैं इस राक्षसों का संहार करता हूँ.. यह रहस्य स्वयं लक्ष्मण भी नहीं जानते थे.

 "लक्ष्मनहु ये मरम न जाना।
जो कछु चरित रचा भगवाना॥"
इसीलिए रावण वध के पश्चात जब श्री राम ने लक्ष्मन से अग्नि प्रज्वलित करने के लिए कहा कि सीता अग्नि पार करके ही मेरे पास आयेंगी.. तो सुमित्रानंदन क्रोधित हो गये कि भइया आप मेरी माता समान भाभी पर संदेह कर र्हे हैं.. मैं ऐसा नहीं होने दुंगा.. तब राम ने लक्ष्मण को सारा रहस्य बताया और कहा हे लक्ष्मण सीता और राम तो एक ही हैं.. सीता पर संदेह का अर्थ है मैं स्वयं पर संदेह कर रहा हूँ... और छायारुपी सीता की बात बताई और कहा कि रावण वास्तविक सीता को अगर छू भी लेता तो तत्काल भस्म हो जाता... इसके बाद स्वयं माता जानकी ने लक्ष्मण से कहा...

"लक्ष्मन हो तुम धर्म के नेगी।
पावक प्रगट करो तुम वेगी॥"
हे लक्ष्मण अगर तुमने धर्म का पालन किया है तो शीघ्रता से अग्नि उत्पन्न करो... उसके बाद छायारुप मां जानकी अग्नि में प्रविष्ट हो गई और वास्तविक सीता मां श्री राम के पास आ गई..॥
वैसे तो उपरोक्त वृतांत रामचरितमानस की चौपाइयों को आधार बनाकर मैंने वर्णन किया है, फिर भी बहुत से ज्ञानी या कहूं मतिमूढ, नकली(छायारुप) सीता वाली बात पर विश्वास नहीं करेंगे... उनके लिए कुछ तथ्य व प्रमाण नीचे सादर प्रस्तुत हैं...

आधुनिक विज्ञान ने ज़ेरोक्स (Xerox) मशीने बनायीं। एक पेपर मशीन में डालो और उसकी जितनी चाहो ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) निकाल लो। आधुनिक विज्ञान ने बॉयलर, कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर जैसी सुविधाजनक तकनीकों को भी आयाम दिया। बॉयलर में ठोस बर्फ डालो और उसे चुटकियों में भाप में बदल दो। इसी तरह भाप को कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर की मदद से वापिस बर्फ में भी बदला जा सकता है।

परन्तु क्या विज्ञानी कोई ऐसी तकनीक बना पाए हैं, जिससे पलक झपकते ही अपनी देह, एक मानव शरीर की ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) बनायी जा सकें? क्या आज की उन्नत लैबोरेटि्यों (प्रयोगशालाओं) में कोई ऐसी तकनीक विकसित हुई है, जिससे अपनी साकार देह को भाप और फिर उसी भाप को ठोस आकार देकर साकार बनाया जा सके? निःसंदेह, वर्तमान वैज्ञानिकों के लिए ये अभी एक परी-कथा ही है। बहुत संभव है कि आपको भी ये बातें कल्पना-जगत की बेलगाम दौड़ लगे।

परन्तु वास्तविकता बिल्कुल अनूठी और विराट है! वास्तव में, एक क्षेत्र ऐसा है जिसके शीश पर इन परमोन्नत तकनीकों के आविष्कारों का सेहरा बंधा है। यह क्षेत्र है- अध्यात्म ज्ञान अथवा वैदिक विज्ञान का! अध्यात्म- पोषित हमारे संत-सत्गुरु और प्राचीन कालीन ऋषिगण इन विलक्षण तकनीकों के कुशल आविष्कारक एवं अनुभवी रहे हैं। वे अपनी देह को इच्छानुसार अदृश्य और प्रकट- वह भी मनचाही गिनती में कई स्थानों पर एक साथ करते रहे हैं।

त्रेताकाल के एक बहु-चर्चित देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का प्रसंग इसका उदाहरण है, वर्णानानुसार देवी-सीता के लंका से लौटने पर श्री राम ने उन्हें ज्यों-का-त्यों स्वीकार नहीं किया। रूखे वचन कहकर उन्हें अपनी चारित्रिक विशुधता प्रमाणित करने को कहा। देवी सीता ने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रचण्ड अग्नि से गुज़रकर ‘अग्नि परीक्षा’ दी। यह ऐतिहासिक दृष्टांत विद्वानों, समाजवादियों, खासकर तथा-कथित नारी-संरक्षकों के लिए सदा से विवाद का विषय रहा है। वे इसे नारी की अस्मिता के प्रति घोर अन्याय मानते आए हैं।

परन्तु ऐसा केवल इसलिए है, क्यूँकि वे इस परीक्षा के तल में छिपे वैज्ञानिक सत्य को नहीं जानते। दरअसल यह लीला एक अनुपम विज्ञान था। इसकी भूमि सीता हरण से पहले ही रची जा चुकी थी।
अध्यात्म रामायाण (अरण्य काण्ड, सप्तम सर्ग) में स्पष्ट रूप से वर्णित है-
अथ रामः अपि ---- शुभे

अर्थात रावण के षड़यंत्र को समझ, प्रभु श्री राम देवी सीता से एकांत में कहते हैं- ‘है शुभे! मैं जो कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। रावण तुम्हारे पास भिक्षु रूप में आएगा। अतः तुम अपने समान आकृति वाली प्रतिबिम्ब देह कुटी में छोड़कर अग्नि में विलीन हो जाओ। एक वर्ष तक वहीं अदृश्य रूप में सुरक्षित वास करो। रावण वध के पश्चात्त तुम मुझे अपने पूर्ववत स्वरुप में पा लोगी।’ आगे (अरण्य काण्ड २३/२) में लिखा है कि प्रभु का यह सुझाव पाकर श्री सीता जी अग्नि में अदृश्य हो गयी व अपनी छायामुर्ति कुटी में पीछे छोड़ गयीं-
जबही राम ---------- सुबिनीता

माँ सीता के इस वास्तविक स्वरुप को पुनः प्राप्त करने के लिए ही अग्नि-परीक्षा हुई थी। सो, यही अग्नि-परीक्षा के पीछे की सच्ची वास्तविकता है।

परन्तु आज का बौधिक व युवा वर्ग इसे एक अलंकारिक अतिशयोक्ति या जादुई चमत्कार मान बैठता है। किन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं है। दार्शनिक स्पिनोजा कहतें हैं'Nothing happens in nature which is in contradiction with its Universal laws'. डॉ. हर्नाक कहते है'जिन्हें हम चमत्कार समझते हैं, वे घटनाएँ भी इस सृष्टि और काल के व्यापक नियमों के आधीन हैं। हाँ, यह बात अलग है कि हम उन उच्च कोटि के नियमों को नहीं जानते हों।'
ऋषि पातंजलि इस प्रतिबिम्ब शरीर को निर्माण देह, बोध शास्त्र निर्माण काया कहते हैं। ‘ एकोअहं बहुस्याम’ की ताल पर श्री कृष्ण का रासलीला के अंतर्गत अनेक स्वरूपों में प्रकट होना; कौशल्यानंदन का शयनकक्ष व रसोईघर में एक समय में ही विद्यमान होना- ये सभी योगविज्ञान के साधारण से प्रयोग हैं।

विपत्ति काल में सत्गुरु अपने दीक्षित शिष्यों की पुकार पर वे एक ही समय में विश्व के अनेकों भागों में समान रूप, रंग, गुण, कौशल व अभेद देह में प्रकट होते रहे हैं और अपना विरद निभाने के लिए आगे भी यूँ ही प्रकट होते रहेंगे।

किस प्रकार यह प्रकटिकरण होता है? दरअसल, इस सृष्टि में जीव, वस्तु या किसी भी प्रकार की सत्ता के निर्माण में दो अनादी तत्त्वों का मेल चाहिए होता है।

उपादान तत्त्व- यह प्रकृति का सूक्ष्म जड़ तत्त्व है। इसके स्थूल रूप को विज्ञान ‘मैटर’ कहता है। यह तत्त्व त्रिगुण (सत्त्व, रजस, तमस) से युक्त होता है। यह एक तरह से सृष्टि की प्रत्येक सत्ता का raw material माना जाता है।

निमित्त तत्त्व- यह एक चैतन्य शक्ति है, जो चेतना के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि व उसके कण-कण में समाई हुई है। इसे वैज्ञानिक शब्दावली में'cosmic precociousness' -भी कहा गया है।

इन दोनों तत्वों के परस्पर संयोग से ही ‘निर्माण’ सधता है। किस प्रकार? आईये, इसके लिए हम एक सरसरी दृष्टि'Creation of Universe'पर डालें, जहाँ ये दोनों तत्त्व अपने शुद्धतम रूप में प्रकट थे और ‘सृष्टि निर्माण’ में विशुद्ध भूमिका निभा रहे थे।

उपादान( Matter ) + निमित्त ( Conciousness ) = सृष्टि (Universe)
दरअसल इस देह रचना में भी ठीक ‘सृष्टि रचना’ का ही विज्ञान काम करता है। वही दो अनादी तत्वों का प्रयोग होता है-ब्रह्मचेतना तथा प्रकृति के उपादान तत्त्व। यूँ तो चेतना प्रत्येक मनुष्य में क्रियाशील रहती है। परन्तु यह प्रगाढ़ वासनाओं, करम- संस्कारों, अविद्या, अज्ञानता से ढ़की और दबी रहती है। अध्यात्म-ज्ञान या ब्रह्मज्ञान की साधना से ये समस्त आवरण दूर होते हैं व चेतना शुद्धतम प्रखर रूप में प्रकट होती है।
पूर्ण आध्यात्मिक विभूतियों ने चेतना के इसी ब्रह्ममय स्वरुप को पाया हुआ होता है।

जब भी आवश्यक होता है, ये पूर्ण चैतन्य विभूतियाँ अपनी ब्रह्ममयी चेतना को प्रकृति के उपादान-तत्त्वों -पर आरूढ़ करती हैं। उनकी यह चेतना प्रकृति के परमाणुओं पर लगाम कसती है ओर उनमें विक्षोभ पैदा कर देती है। फिर अपनी इच्छानुसार परमाणुओं में आकर्षण- विकर्षन कर स्वयं अपनी आकृति की देह निर्मित्त कर लेती हैं। वह भी मनचाही संख्या में!! अंततः इस ‘निर्माण देह’ में ‘निर्माण चित्त’ को भी प्रवेश कराके उसे पूर्ण रूप से सजीव कर देती हैं।

देवी सीता के विषय में भी ठीक यही अनादी विज्ञान प्रयोग में लाया गया था। सीता स्वयं में साक्षात चेतना-स्वरूपिणी -माँ भगवती थीं। उनके लिए प्रकृति के जड़- तत्त्वों से छेड़छाड़ करके एक प्रतिबिम्ब देह निर्मित कर्म दर्पण देखने के समान सहज था।

परन्तु उनके सन्दर्भ को पूरी तरह प्रकाशित करने के लिए हमें एक तथ्य और जानना होगा। वह यह की वेदों में आदिकालीन ब्रह्म-चेतना को ‘वैश्वानर अग्नि’ भी कहा गया है। ब्रह्मसूत्र में इस अग्नि के विषय में यह बताया गया की यह अग्नि न तो कोई दैविक अग्नि है, न ही भौतिक है। यह निःसंदेह आदिकाल की ब्रह्म-अग्नि ही है।
ऋगवेद में कहा गया है (१-५८-१)-

जब यह अग्नि प्रकट होती है, तो अंतरिक्ष में फैल जाती है। यह प्रकृति के परमाणुओं को सही मार्गों पर ले चलती है और उनका निर्माण कार्य में प्रयोग करती है।

यहीं नहीं ऋग्वेद में एक अन्य ऋषि का कहना है –
केवल प्रकृति के कण-कण में ही नहीं, यह अग्नि मनुष्य के अंग-अंग में भी विद्यमान होती है। परन्तु ध्यान दें, यह अग्नि विद्यमान तो सब में होती है। लेकिन विशुद्ध रूप से प्रकट केवल विकसित आत्माओं में ही होती है-
(ऋग्वेद १-१-२)

यह अग्नि पूर्व (कल्प) के ऋषियों को ज्ञात थी। इस युग के ऋषियों को भी ज्ञात है। यह सभी दैव-स्वरुप आत्माओं को ज्ञात होती है।

अब इन समस्त जानकारियों को साथ लेकर हम सीता-अग्नि-परीक -्षा के प्रसंग का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं।
देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का वैज्ञानिक विश्लेषण :
ऋग्वेद (१-५८-२ ) में वैश्वानर अग्नि की त्रि-स्तरीय भूमिका दर्शायी गई है।
वैश्वानर अग्नि शाश्वत चेतना है । यह प्रकृति के परमाणुओं को -
1. Integrate - संयुक्त करती है।
2. Disintegrate- पृथक भी करती है ।
3. Preserve- सुरक्षित भी रखती है।
यह तीनों वही भूमिकाएँ हैं, जो सृष्टि-निर्माण- -कार्य में ब्रह्म-चेतना की थीं। और यही वे वैज्ञानिक क्रियाएँ हैं, जो सीता-अग्नि-परीक -्षा में भी प्रयोग की गईं। सीता-हरण से पूर्व जब श्री राम ने देवी सीता को अपना प्रतिबिम्ब पीछे छोड़कर अग्नि में निवास करने को कहा , तो वास्तव में क्या हुआ? क्या वैज्ञानिक-लीला घटी ? सीता ने तत्क्षण अग्नि प्रकट की। कदाचित यह कोई लौकिक अग्नि नहीं, वैश्वानर अग्नि ही थी। अर्थात सीता ने अपनी ब्रह्म चेतना को सक्रिय किया। फिर उसके द्वारा प्रकृति के परमाणुओं में हस्तक्षेप किया। उन्हें प्रयोजनानुसार जोड़कर एक अन्य निज-देह प्रकट कर ली। यह पहली वैज्ञानिक क्रिया थी।

इसके पश्चात माँ सीता ने ब्रह्म-चेतना या वैश्वानर अग्नि के द्वारा अपनी वास्तविक देह के परमाणुओं को अलग-अलग कर दिया। प्रसंग के अनुसार माँ सीता कि वास्तविक देह अग्नि में विलीन हो गयी थी। अग्नि में यह विलीनता वैज्ञानिक स्तर पर वैश्वानर अग्नि द्वारा देह का उपादान तत्व में बिखर जाना अर्थात'disintegration -of body'ही था। यह दूसरी वैज्ञानिक क्रिया थी।

फिर ये पृथक तत्त्व या परमाणु एक वर्ष तक उनकी वैश्वानर अग्नि के संरक्षण में रहे। उसी वैश्वानर अग्नि अथवा ब्रह्म-चेतना के, जो सकल सृष्टि के परमाणुओं की रक्षा करती है व जिसका आह्वान कर ऋषियों ने कहा- (ऋग्वेद १-१-१) - हे अग्नि स्वरूप ब्रह्म-चेतना! पिता स्वरुप में , अपनी संतान की तरह हमारी रक्षा करो। कहने का आशर्य यह है कि सीता सशरीर नहीं, परमाणुओं के रूप में ब्रह्माण्ड की वैश्वानर अग्नि में समाहित रहीं। यह तीसरी वैज्ञानिक प्रक्रिया थी ।

 एक वर्ष बाद.. विजय बिगुल बजे और पुनर्मिलन की बेला आई। तब पुनः यहीं विज्ञान दोहराया गया। रामायण (युद्धकाण्ड सर्ग १२/७५ ) के प्रसंगानुसार -
राघव ने एक विशेष कार्य के लिए निर्मित मायावत सीता को देखा और अग्नि-परीक्षा देने को कहा। श्री राम का यह कथन, वास्तव में देवी सीता को पुनः उसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का संधान करने की प्रेरणा ही थी। उस समय प्रतीकात्मक रूप में भौतिक अग्नि जलाई गयी। परन्तु सीता जी का आह्वान तो वैश्वानर अग्नि के प्रति ही था।
(युद्धकाण्ड सर्ग -१३ )- हे सर्वव्यापक! अति पावन! लोक साक्षी अग्नि !...स्पष्ट है, ये संबोधन लौकिक अग्नि के लिए नहीं हो सकते थे। अतः लौकिक अग्नि की आड़ मेंवैश्वानर-अग् -नि (ब्रह्मचेतना) पुनः सक्रिय हुई। उसने सीता जी की प्रतिबिम्ब देह के परमाणुओं को बिखेर कर पुनः प्रकृति में मिला दिया।

फिर वास्तविक देह के परमाणुओं को एकत्र कर पूर्ववत जोड़ दिया। देवी सीता को सुरक्षित रूप में श्री राम के समक्ष प्रकट किया। यहीं वैज्ञानिक विलास प्रतीकात्मक शैली में इस प्रकार रखा गया- लोक साक्षी भगवन वास्तविक जानकी को पिता के समान गोद में बिठाए हुए प्रकट हुए और रघुनाथ जी से बोले- मेरे पितास्वरूप संरक्षण में सौंपी हुई जानकी को पुनः ग्रहण कीजिये।

वह प्रतिबिंबरुपिणी -सीता जिस कार्य के लिए रची गयी थी, उसे पूरा करके पुनः अदृश्य हो गयी है।
यह वचन सुनकर श्री राम ने अत्यंत प्रसन्नता से जानकी जी को स्वीकार कर लिया। उसी क्षण इस विज्ञान के ज्ञाताओं - ब्रह्मा, महेश आदि देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। परन्तु अवैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों ने उस काल से आज तक कभी सीता पर कलंक, तो कभी राम पार आक्षेप लगाए।
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Tuesday, October 29, 2013

हिंदू शब्द की उत्पत्ति


हिंदू शब्द की उत्पत्ति...

अक्सर हम हिन्दू लोगों को बरगलाने के लिए हमें यह सिखाया जाता है कि “हिन्दू” शब्द हमें मुस्लिमों या फिर कहा जाए तो अरब वासियों ने दिया है…!

दरअसल ऐसी बातें करने के पीछे कुछ स्वार्थी तत्वों का मकसद यह रहा होगा कि हिन्दू अपने लिए “हिन्दू” शब्द सुनकर खुद में ही अपमानित महसूस करें और, हिन्दुओं में आत्मविश्वास नहीं आ पाए फिर हिन्दुओं को खुद पर गर्व करने या दुश्मनों के विरोध की क्षमता जाती रहेगी !

और, बहुत दुखद है कि समुचित ज्ञान के अभाव में बहुत सारे हिन्दू भी उसकी ऐसी बिना सर-पैर कि बातों को सच मान बैठे हैं और, खुद को हिन्दू कहलाना पसंद नहीं करते हैं जबकि, सच्चाई इसके बिल्कुल ही उलट है…!

हिन्दू शब्द हमारे लिए अपमान का नहीं बल्कि गौरव की बात है और, हमारे प्राचीन ग्रंथों एक बार नहीं बल्कि, बार-बार “हिन्दू शब्द” गौरव के साथ प्रयोग हुआ हुआ है….!

वेदों और पुराणों में हिन्दू शब्द का सीधे -सीधे उल्लेख इसीलिए नहीं पाया जाता है कि वे बेहद प्राचीन ग्रन्थ हैं और, उस समय हिन्दू सनातन धर्म के अलावा और कोई भी धर्म नहीं था जिस कारण उन ग्रंथों में सीधे -सीधे हिन्दू शब्द का उपयोग बेमानी था..!

साथ ही वेद पुराण जैसे ग्रन्थ मानव कल्याण के लिए हैं हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई जैसे क्षुद्र सोच उस समय नहीं थे इसीलिए उन ग्रंथों में हिन्दू शब्द पर ज्यादा दवाब नहीं दिया है लेकिन प्रसंगवश हिन्दू और हिन्दुस्थान शब्द का उल्लेख वेदों में भी है..!

☻ ऋग्वेद में एक ऋषि का नाम “सैन्धव” था जो बाद में “हैन्दाव/ हिन्दव” नाम से प्रचलित हुए जो बाद में अपभ्रंश होकर “”हिन्दू”" बन गया..!

☻ साथ ही ऋग्वेद के ही ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द इस प्रकार आया है…

हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।

( अर्थात... हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं )

☻ सिर्फ वेद ही नहीं बल्कि मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ ) में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है...

‘हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्चते प्रिये’

( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं )

☻ इतना ही नहीं लगभग यही मंत्र यही मन्त्र शब्द कल्पद्रुम में भी दोहराई गयी है...

‘हीनं दूषयति इति हिन्दू ‘
( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं )

☻ पारिजात हरण में “हिन्दू” को कुछ इस प्रकार कहा गया है |

हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टम ¡
हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

☻ माधव दिग्विजय में हिन्दू शब्द इस प्रकार उल्लेखित है...

ओंकारमंत्रमूलाढ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।
गोभक्तो भारतगुरू र्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ॥

( अर्थात... वो जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनि माने... कर्मो पर विश्वास करे, गौ पालक रहे तथा बुराइयों को दूर रखे वो हिन्दू है )

☻ और तो और हमारे ऋग्वेद (८:२:४१) में ‘विवहिंदु’ नाम के राजा का वर्णन है जिसने 46000 गाएँ दान में दी थी विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानीराजा था और, ऋग वेद मंडल 8 में भी उसका वर्णन है|

## सिर्फ इतना ही नहीं हमारे धार्मिक ग्रंथों के अलावा भी अनेक जगह पर हिन्दू शब्द उल्लेखित है...

** (656 -661 ) इस्लाम के चतुर्थ खलीफ़ा अली बिन अबी तालिब लिखते हैं कि वह भूमि जहां पुस्तकें सर्वप्रथम लिखी गईं, और जहां से विवेक तथा ज्ञान की‌ नदियां प्रवाहित हुईं, वह भूमि हिन्दुस्तान है। ( स्रोत : ‘हिन्दू मुस्लिम कल्चरल अवार्ड ‘- सैयद मोहमुद. बाम्बे 1949.)

** नौवीं सदी के मुस्लिम इतिहासकार अल जहीज़ लिखते हैं...

“हिन्दू ज्योतिष शास्त्र में, गणित, औषधि विज्ञान, तथा विभिन्न विज्ञानों में श्रेष्ठ हैं। मूर्ति कला, चित्रकला और वास्तुकला का उऩ्होंने पूर्णता तक विकास किया है। उनके पास कविताओं, दर्शन, साहित्य और नीति विज्ञान के संग्रह हैं। भारत से हमने कलीलाह वा दिम्नाह नामक पुस्तक प्राप्त की है।
इन लोगों में निर्णायक शक्ति है, ये बहादुर हैं। उनमें शुचिता, एवं शुद्धता के सद्गुण हैं। मनन वहीं से शुरु हुआ है।

☻ इस तरह हम देखते हैं कि इस्लाम के जन्म से हजारों-लाखों साल पूर्व से हिन्दू शब्द प्रचलन में था और, हिन्दू तथा हिन्दुस्थान शब्द पूरी दुनिया में आदर सूचक एवं सम्मानीय शब्द था…!

साथ ही इन प्रमाणों से बिल्कुल ही स्पष्ट है कि हिन्दू शब्द ना सिर्फ हमारे प्राचीन ग्रंथों में उल्लेखित है बल्कि हिन्दू धर्म और संस्कृति हर क्षेत्र में उन्नत था साथ ही, हमारे पूर्वज काफी बहादुर थे और उनमे निर्णायक शक्ति थी जिस कारण विधर्मियों की हिन्दू और हमारे हिंदुस्तान के नाम से ही फट जाती थी जिस कारण उन्होंने ये अरब वाली कहानी फैला रखी है…!

इसीलिए मित्रों... सेकुलरों और धर्मभ्रष्ट अवं पथभ्रष्ट लोगों कि नौटंकियों पर ना जाएँ और ”गर्व से कहो, हम हिन्दू हैं ” ।
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Tuesday, May 28, 2013

About Hindu Word in Hindi



"हिन्दू" शब्द का अर्थ जरुर पढ़े और पढाये...

अगर कोई केहता है की वो मरने से नही डरता,
तो या तो वो जुढ बोल रहा है... या फिर वो हिन्दू है.

कुछ ब्लोगर्स ने आजकल हिंदू संस्कृति को बदनाम करने का ठेका ले रक्खा है वो चाहे हिंदू त्यौहार हों अथवा हिंदू देवी देवता। और इससे भी बड़ा दुख जब होता है जब हिंदू समाज के ही कुछ लोग उनके समर्थन में टिपण्णी छोड़ते है।

अभी हाल ही में मैंने एक ब्लॉग पर एक लेख पढ़ा। वह बुद्धिहीन ब्लोगर लिखता है कि "हिंदू शब्द की उत्पत्ति १७ वीं शताब्दी में हुई है।" उदहारण के रूप में उसने नेहरू की डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" का उदाहरण प्रस्तुत किया है। नेहरू की वह पुस्तक नेहरू की तरह झूंठ का पुलिंदा है। नेहरू अपने आप में कितना झूठा व हिंदू विरोधी था यह सच आज सबके सामने खुलता जा रहा है।

हिंदू शब्द भारतीय विद्दवानो के अनुसार कम से कम ४००० वर्ष पुराना है।

शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी शताब्दी में रचित है, में मन्त्र है...

"हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:"
अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है।

इसी प्रकार अदभुत कोष में मन्त्र आता है...

"हिंदू: हिन्दुश्च प्रसिद्धौ दुशतानाम च विघर्षने"।
अर्थात हिंदू और हिंदु दोनों शब्द दुष्टों को नष्ट करने वाले अर्थ में प्रसिद्द है।

वृद्ध स्म्रति (छठी शताब्दी)में मन्त्र है...

हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्पर:।
वेद्.........हिंदु मुख शब्द भाक्। "
अर्थात जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर चलने वाला, हिंसा से दुख मानने वाला है, वह हिंदु है।

ब्रहस्पति आगम में श्लोक है...

"हिमालय समारभ्य यवाद इंदु सरोवं।
तं देव निर्वितं देशम हिंदुस्थानम प्रच्क्षेत ।
अर्थात हिमालय पर्वत से लेकर इंदु(हिंद) महासागर तक देव पुरुषों द्बारा निर्मित इस छेत्र को हिन्दुस्थान कहते है।

पारसी समाज के एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है...

"अक्नुम बिरह्मने व्यास नाम आज हिंद आमद बस दाना कि काल चुना नस्त"।
अर्थात व्यास नमक एक ब्र्हामन हिंद से आया जिसके बराबर कोई अक्लमंद नही था।

इस्लाम के पैगेम्बर मोहम्मद साहब से भी १७०० वर्ष पुर्व लबि बिन अख्ताब बिना तुर्फा नाम के एक कवि अरब में पैदा हुए। उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है...

"अया मुबार्केल अरज यू शैये नोहा मिलन हिन्दे।
व अरादाक्ल्लाह मन्योंज्जेल जिकर्तुं॥
अर्थात हे हिंद कि पुन्य भूमि! तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना है।

१० वीं शताब्दी के महाकवि वेन... अटल नगर अजमेर, अटल हिंदव अस्थानं ।
महाकवि चन्द्र बरदाई... जब हिंदू दल जोर छुए छूती मेरे धार भ्रम ।

जैसे हजारो तथ्य चीख-चीख कर कहते है की हिंदू शब्द हजारों-हजारों वर्ष पुराना है। इन हजारों तथ्यों के अलावा भी लाखों तथ्य इस्लाम के लूटेरों ने तक्ष शिला व नालंदा जैसे विश्व -विद्यालयों को नष्ट करके समाप्त कर दिए।
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Friday, November 9, 2012

भगवान् राम और माँ सीता के विवाह से सम्बंधित कुछ भ्रान्तियो का जबाब

हाल ही में नेट पर देखा की कुछ विशिष्ट जन को भगवान राम और माँ सीता के विवाह के सन्दर्भ में कुछ भ्रान्ति है. कुछ तर्क वाल्मीकि रामायण से लेकर ये निष्कर्ष निकला जा रहा है की विवाह के वक़्त माँ सीता की उम्र महज छ साल की थी, जो कतई सही नहीं है.

जैसा की हम सब जानते है, समय के साथ साथ लोगो ने धर्म को अपनी सुविधा और धर्म के व्यापार के हिसाब से तोड़ मरोड़ दिया है. उदहारण के तौर पर हिन्दू धर्म में के कुछ कुख्यात बाबाओ के कारनामे हमने पिछले एक महीनो में हर हफ्ते देखे सुने और पढ़े है. ठीक वैसे ही मुस्लिम धर्म में कुछ लोग मानते है की किसी भी बेगुनाह को मारने वाले को अल्लाह कभी माफ़ नहीं करता वही मुस्लिम कुछ लोग इस तरह के खून खराबे को अल्लाह के रसूल का हुकुम मान कर आतंक को धर्म का पर्याय बनाने को आतुर है. कहने का तात्पर्य ये है की समय के साथ साथ मान्यताये बदली और फिर अल्पबुद्धि लोगो ने धर्म ग्रंथो का अपनी सुविधा के हिसाब से व्याख्यान कर दिया. कहा भी गया है धर्म प्रदर्शन की नहीं अपितु धारण करने की चीज़ है. धर्म वो है जो व्यक्ति को संयमी बनाता है.

राम जन्म :बाल काण्ड सर्ग १८ शलोक ८-९-१० में महार्षि वाल्मीक जी ने उल्लेख किया है कि श्री राम जी का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अभिजित महूर्त में मध्याह्न में हुआ था। कंप्यूटर द्वारा गणना करने पर यह २१ फरवरी, ५११५ ई पू आता है। इस दिन नवमी तो आती है लेकिन नक्षत्र पुष्य आता है। नवमी तिथि के बारे में तुलसी राम चरितमानस में भी उल्लेख मिलता है एवं रामनवमी चैत्र शुकल की नवमी को ही मनाई जाती है। बाल काण्ड के दोहा १९० के बाद की प्रथम चौपाई में तुलसीदास जी लिखते हैं

नौमी तिथि मधुमास पुनीता, सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता |मध्य दिवस अति सीत न धामा , पावन काल लोक विश्रामा ||

पवित्र चैत्र मास के शुकल पक्ष की नवमी तिथि को मधाहं में अभिजित महूर्त में श्री राम का जन्म हुआ था। अतः नवमी तिथि को आधार मान कर एवं नक्षत्र की अनदेखी कर राम नवमी तिथि की गणना करते हैं तो २१ फरवरी ५११५ ई पू प्राप्त होती है। इस प्रकार राम जन्म को ७१२५ वर्ष पूरे हो चुके है.

तपोवन :श्री राम १६वे वर्ष में ऋषी विश्वमित्र के साथ तपोवन को गए थे। इस तथ्य की पुष्टि वाल्मीक रामायण के बाल काण्ड के वीस्वें सर्ग के शलोक दो से भी हो जाती है, जिसमे राजा दशरथ अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहते हैं- उनका कमलनयन राम सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ और उसमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता भी नहीं है।

उनषोडशवर्षो में रामो राजीवलोचन: न युद्धयोग्य्तामास्य पश्यामि सहराक्षसौ॥ (वाल्मीक रामायण /बालकाण्ड /सर्ग २० शलोक २)

चूँकि भगवान राम विश्वामित्र के साथ सोलह वर्ष की उम्र में गए थे और उसके बाद ही उनका विवाह हुआ था इसे ये सिद्ध हो जाता है की प्रभु रामकी शादी सोलह वर्ष के उपरान्त हुई थी. माँ सीता की उम्र के विषय में वाल्मीकि रामायण के जिन श्लोको से निष्कर्ष निकला जा रहा है, वे श्लोक है :

उषित्वा द्वा दश समाः इक्ष्वाकुणाम निवेशने | भुंजाना मानुषान भोगतसेव काम समृद्धिनी || ३-४७-४ ||मम भर्ता महातेजा वयसा पंच विंशक ||३-४७-१० ब || अष्टा दश हि वर्षिणी नान जन्मनि गण्यते ||३-४७-११ अ ||गौर से ध्यान दे की पहले श्लोक में द्वा और दश शब्द अलग अलग है. येद्वादश यानि बारह नहीं बल्कि द्वा ”दो” को और दश ”दशरथ” कोसंबोधित करता है. इसमें माँ सीता, रावन से, कह रही है की इक्ष्वाकु केराजा दशरथ के यहाँ पर दो वर्ष में उन्हें हर प्रकार के वे सुख जो मानव के लिए उपलब्ध है उन्हें प्राप्त हुए है.

दुसरे श्लोक में माँ सीता कह रही है की उस समय (वनवास प्रस्थान के समय) मेरे तेजस्वी पति की उम्र पच्चीस साल थी और उससमय मैं जन्म से अठारह वर्ष की हुई थी. इसे ये ज्ञात होता है की वनवास प्रस्थान के समय माँ सीता की उम्र अठारह साल की थी औरवो करीब दो साल राजा दशरथ के यहाँ रही थी यानि माँ सीता की शादी सोलह साल की उम्र के आस पास हुई थी. ये केवल सोच और समझ का फेर है.

द्वादश को एक साथ जोड़ने पर ये बारह वर्ष बन जाते है और द्वा यानि दो और दश यानि दशरथ को विच्छेद करने पर एक नवीन अर्थ आ जाता है. इसी कारण कुछ टीकाकारो ने ये मान लिया की सीता जी को विवाह उपरांत बारह वर्ष अयोध्या में रही थी और इस गणित के हिसाब से माँ सीता को विवाह के समय छ वर्ष का मान लिया है.

उदहारण के तौर पर मान लीजिये कोई कहना चाह रहा है कि “उस समय छोटे बच्चो को कमरे में बंद रखा जाता था” लेकिन इस वाक्य में एक रिक्त स्थान अपने स्थान से एक शब्द आगे सरक जाता है तो ये वाक्य कुछ यूँ बन जायेगा “उस समय छोटे बच्चो को कमरे मेंबंदर खा जाता था”. देखा आपने एक रिक्त स्थान के केवल एक वर्णाक्षर से आगे बढ़ जाने पर वाक्य के अर्थ का कैसा अनर्थ हो गया. क्या कहना चाह रहे थे और क्या कह दिया. अब जब हमारे वेद और ग्रन्थ जो सदियों पहले लिखे गए थे. पेड़ के पत्तो पर लिखे  हुए उन श्लोको को आज अगर हम किताब में छपा हुआ  देखते है तो स्वाभाविक है की इतने रूपांतरण के दौरान  उनका अपने मूल रूप से थोडा बहुत परिवर्तित होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है.

भगवान् ने इसीलिए सबको अक्ल दी है ताकि हम इसका सही इस्तेमाल करे और खुले दिमाग से सोच कर और अपनी समझ के हिसाब से इनकी सही व्याख्या कर सके. तुलसी रामायण में और भी कई दृष्टांत है, जिसमे माँ सीता को विवाह के समय किशोर अवस्था का बतलाया गया है न की बाल्यावस्था का. पुष्पवाटिका में सीता जी जब माँ भवानी का पूजन के लिए आई थी तो उस समय तुसलीदास जी ने लिखा है :संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥यानी सीता जी के साथ में सब सुंदरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणी से गीत गा रही हैं। “सयानी” शब्द से साफ़ है की माँ सीता बाल्यावस्था को पार कर गई है.

आज शायद इन चीजो को न तो को ढंग से समझने वाला शिष्य है और न ही समझाने वाला गुरु. और फिर ये अपनी अपनी सोच और भावना है क्योनी तुलसी बाबा ने रामचरितमानस में लिखा है, “जिनकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी”. मानो तो भगवान् नहीं मानो तो पत्थर.
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Friday, October 19, 2012

यज्ञ का रहस्य

यज्ञ का रहस्य

यज्ञ का रहस्य।

वेदानुसार यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं-(1) ब्रह्मयज्ञ (2) देवयज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।

यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म। श्रेष्ठ कर्म। सतकर्म। वेदसम्मत कर्म। सकारात्मक भाव से ईश्वर-प्रकृति तत्वों से किए ग

ए आह्‍वान से जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है।

(1) ब्रह्मयज्ञ : जड़ और प्राणी जगत से बढ़कर है मनुष्‍य। मनुष्‍य से बढ़कर है पितर, अर्थात माता-पिता और आचार्य। पितरों से बढ़कर हैं देव, अर्थात प्रकृति की पाँच शक्तियाँ और देव से बढ़कर है- ईश्वर और हमारे ऋषिगण। ईश्‍वर अर्थात ब्रह्म। यह ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से। इसके करने से ऋषियों का ऋण अर्थात 'ऋषि ऋण' ‍चुकता होता है। इससे ब्रह्मचर्य आश्रम का जीवन भी पुष्‍ट होता है।

(2) देवयज्ञ : देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। यह भी संधिकाल में गायत्री छंद के साथ किया जाता है। इसे करने के नियम हैं। इससे 'देव ऋण' चुकता होता है।
हवन करने को 'देवयज्ञ' कहा जाता है। हवन में सात पेड़ों की समिधाएँ (लकड़ियाँ) सबसे उपयुक्त होतीं हैं- आम, बड़, पीपल, ढाक, जाँटी, जामुन और शमी। हवन से शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। रोग और शोक मिटते हैं। इससे गृहस्थ जीवन पुष्ट होता है।

(3) पितृयज्ञ : सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है।

(4) वैश्वदेवयज्ञ : इसे भूत यज्ञ भी कहते हैं। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। ऐसा वेद-पुराण कहते हैं।

(5) अतिथि यज्ञ : अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्त्तव्य है।
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Sunday, July 15, 2012

धर्म क्या है?



धर्म क्या है??? कोई धर्म है ही नहीं है......!!!
(हिन्दू आर्य ( सनातन , बोद्ध , जैन , सिख ) = धर्म केवल सनातन धर्म, हिंदू सनातन धर्म का वैज्ञानिक और भोगोलिक रूप है, जैसे आज भारत में रहने बाले भारतीय है, वैसे ही हिमालय और सिंधु नदी से हिंदू शब्द बना, हिमायल से हि और सिन्दू से न्दू, हिन्दू आर्य एक जाति है जिसका मतलब श्रेष्ठ होता है, आर्यब्रत में रहने बाले आर्य और दविड़ होते थे आर्यब्रत क्षेत्र अरब से लेकर जापान तक था, तब इस्लाम नहीं था न ईसाई, लेकिन लोग तो वही है, इस लिए आर्य इस्लामिक और ईसाई भी है )

हाँ, हिंदु धर्म कोई धर्म नहीं है क्योंकि धर्म कोई ना कोई कर्म होता है और हिंदु किसी प्रकार का कोई कर्म नहीं है। हिंदु तो बस भारतीयों का सम्बोधन मात्र है। हिंदु धर्म है या नहीं इस पर विचार करने से पहले ये विचार करना होगा कि धर्म क्या होता है।

धर्म को मुसलमान, ईसाई, हिंदु, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि प्रकारों में बाँट दिया गया है क्योंकि इनलोगों के पूजा करने के तरीके भिन्न-भिन्न हैं, और ये अलग-अलग गुरुओं पर अपनी विश्वास या श्रद्धा रखते है। मुसलमान अपना रसूल मुहम्मद को मानते हैं, ईसाई इसामसीह को ,जैन महावीर को आदि-आदि पर एक प्रश्न कि क्या किसी भी प्रकार से भगवान की पूजा-पाठ करना ही धर्म है??? अगर हाँ तो फिर क्या एक नास्तिक व्यक्ति धार्मिक नहीं कहला सकता है?? जबकि सच्चाई ये है कि एक नास्तिक व्यक्ति धार्मिक और भगवान का प्यारा हो सकता है, और एक आस्तिक व्यक्ति भी अधार्मिक हो सकता है।

दूसरा प्रश्न ये कि अगर किसी गुरु, रसूल, पैगंबर या ईश्वर के पुत्र पर या राम-कृष्ण पर विश्वास करना ही धर्म है तो फिर हिंदु में तो लाखों-करोड़ो गुरु हैं। सब लोग अपने-अपने गुरु पर श्रद्धा रखते हैं और उनके बताए अनुसार ईश्वर की आराधना करते हैं, तो इस तरह से तो हिंदु में ही लाखों धर्म होना चाहिए। जैसे आसाराम बापू जी के अनुयायी आसाराम धर्म वाले या कृपालु जी के अनुयायी कृपालु धर्म वाले। पर ऐसा नहीं है क्यों??? अगर मुहम्मद पर विश्वास करने वाले एक अलग मुसलमान धर्म कहलाते हैं तो अन्य किसी गुरु पर विश्वास करने वाले भी अन्य धर्म वाले क्यों नहीं बन जाते??

सच बात तो ये है कि ना तो नमाज पढ़ना धर्म है ना गिरिजाघर में जाकर प्रार्थना करना धर्म है, ना किसी मंदिर में जाकर फूल-बेलपत्र चढ़ाकर पूजा करना धर्म है और ना ही ध्यान लगाना या हिमालय पर जाकर कठोर तपस्या कर लेना। भगवान पर विश्वास करना या किसी प्रकार से उनकी पूजा-आराधना करना धर्म नहीं है, बल्कि ये सिर्फ हमें धार्मिक बनाने के लिए एक सहायक उपाय हैं। आज सब लोगों के लिए धर्म का अर्थ भगवान की किसी ना किसी प्रकार से पूजा-आराधना करना है। धर्म बस भगवान तक ही सिमट कर रह गया है। धर्म की परिभाषा बस ईश्वर के आस-पास ही घूमती रहती है। पर आज जरूरत है धर्म के उस परिभाषा की जिसमें किसी भगवान या पैगंबर का उल्लेख ना हो।

एक उदाहरण से समझते हैं।- -रामपुर गाँव में एक बगीचा था जिसमें अनगिनत फलों के पेड़ लगे हुए थे। बहुत ही विशाल और सुंदर बगीचा था वो। ये बगीचा अपने गुणों के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। गाँव के नाम पर ही उस बगीचे का नाम रामपुर बगीचा हो गया और उस बगीचे के सारे फल रामपुर बगीचे के फल के नाम से पहचाने जाने लगे। हालांकि सभी फलों के अलग-अलग नाम थे पर चूंकि सारे फल बहुत ही स्वादिष्ट थे इसलिए किसी को फल के नाम से कोई मतलब नहीं था। सब बस रामपुर बगीचे के फल के नाम से ही सारे फलों को जानते थे। उन फलों में एक फल ऐसा भी था जो बहुत ही स्वादिष्ट था और वो फल सिर्फ रामपुर बगीचे में ही था अन्य किसी दूसरे बगीचे में नहीं। 


कुछ समय के बाद वो फल रामपुर बगीचा का पहचान बन गया और उस फल का नाम भी रामपुर फल हो गया। लोग अन्य फलों की तरफ ध्यान कम देते,ज्यादा ध्यान उस रामपुर फल पर ही देने लगे। रामपुर फल का उपयोग काफी बढ़ गया तथा अन्य फलों को लोग भूलने लगे। एक समय ऐसा आया जब फल का मतलब लोग बस रामपुर फल ही समझने लगे। फल की परिभाषा बस रामपुरिया तक ही सिमटकर रह गया। जो व्यक्ति सिर्फ रामपुर फल खाते थे वो फल खाने वाले व्यक्ति समझे जाने लगे और जो लोग रामपुर बगीचे के अन्य फल खाते थे वे फल ना खाने वाले व्यक्ति समझे जाने लगे।

मेरी यह कहानी सबकुछ समझाने के लिए पर्याप्त है ।ये कहानी भारत,हिंदु और धर्म के साथ घटी घटना का प्रतिनिधित्व करती है। चलिए अब घूमा-फिराकर कहने की बजाय सीधे-सीधी बात करते हैं। धर्म क्या है???

इसका उत्तर शायद कोई यह दे सकता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए जो उपाय किए जाते हैं वो धर्म हैं। ठीक है। ये परिभाषा गलत नहीं है पर इस परिभाषा से मोक्ष-प्राप्ति का स्वार्थ मन में आ जाता है जो व्यक्ति को धर्म के मार्ग से भटका देता है क्योंकि मोक्ष-प्राप्ति का लोभ आ जाने पर इसकी पूर्ति में जो तत्व बाधक बनेंगे वो क्रोध का कारण बन जाएगा जो हमें धर्म मार्ग से भटका देगा।

धर्म या अधर्म का संबंध कर्म से होता है। हमारे द्वारा किया गया हरेक कार्य यहाँ तक कि हमारा सोना-उठना,खाना-पीना आदि दैनिक कार्य भी धर्म और अधर्म की श्रेणी में आता है। हमारे द्वारा किया गया हरेक कार्य या तो धर्म होता है या अधर्म। अब ये उस कार्य पर निर्भर करता है कि वो कार्य किस हद तक यानि कितना बड़ा धर्म है या कितना बड़ा अधर्म।

चूंकि कार्य अनगिनत हैं और परिस्थियाँ भी हमेशा बदलती रहती हैं, इसलिए कर्म को आधार मानकर धर्म की परिभाषा नहीं दी जा सकती। किसी भी कर्म को धर्म की परिभाषा के अन्तर्गत लाना अज्ञानता है क्योंकि जो कार्य किसी समय धर्म है वही कार्य दूसरे समय में अधर्म भी बन सकता है। अब प्रश्न ये उठता है कि हम ये निर्णय कैसे करें कि किस परिस्थिति में कौन सा कर्म धर्म है?

तो इस समस्या का बहुत ही सरल समाधान है। हमारा उद्देश्य,हमारी भावना। अच्छी भावना के साथ किया गया कर्म या कहें कि अच्छे उद्देश्य के लिए किया गया पाप से पाप कर्म भी धर्म है जबकि बुरा उद्देश्य लेकर बुरी भावना के साथ किया गया अच्छे से अच्छा कर्म भी पाप या अधर्म है। उदाहरण के लिए किसी स्त्री का बलात्कार करना सबसे बड़ा पाप कर्म है पर ये कर्म भी धर्म बन सकता है। जैसे श्री हरि को जालंधर की पत्नी वृंदा का शीलहरण करना पड़ा। ये कर्म पाप कर्म होते हुए भी धर्म बन गया था। हिंसा करना पाप है लेकिन युद्ध में हिंसा करना धर्म है।

दूसरी तरफ पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन करना सबसे बड़ा पुण्य कार्य माना जाता है परंतु राजा दक्ष के द्वारा किया गया यज्ञ पाप कर्म था जिसके फलस्वरूप उसका विनाश हो गया। दक्ष ने शिव जी को अपमानित करने की भावना से यज्ञ कराया था। अपने इस बुरे विचार के साथ किया गया उसका पुण्य कर्म भी पापकर्म बन गया और उसके सर्वनाश का कारण बन गया।

प्रेम भाव से खिलाया गया शबरी का जूठा बेर भी भगवान राम को स्वादिष्ट लग रहा था। विदुर की पत्नी भगवान कृष्ण को केले के फल के बजाय उसका छिलका ही खिलाए जा रही थी और भगवान बड़े आनंद से खा भी रहे थे। विदुर जी अपनी पत्नी को टोकने ही वाले थे कि कृष्ण जी ने विदुर जी को रोक दिया और मग्न होकर छिलका ही खाते रहे। इन सब बातों से ये अर्थ निकलता है कि धर्म का संबंध कर्म से नहीं भावना से है। इसलिए तो ईश्वर के प्रति अपने हृदय में प्रेम और भक्ति रखकर लोग पेड़-पौधे,जानवर और पत्थर को पूजकर भी धन्य हो जाते हैं।

"हिन्दू धर्म, धर्म ही नहीं है"-ये शीर्षक मैंने इसलिए रखा है कि धर्म का कोई नाम होता ही नहीं है। धर्म तो कर्म या कर्तव्य होता है। जैसे अगर कोई स्त्री अपने पति के प्रति एकनिष्ठ होती है तो इसे पतिव्रता-धर्म कहते हैं। एक पुत्र का अपने पिता के प्रति जो कर्त्तव्य होता है उसे पितृ-धर्म कहते है। राष्ट्र के प्रति जो कर्त्तव्य होता है उसे राष्ट्र-धर्म कहते हैं। धर्म कर्तव्य का ही दूसरा नाम है। कर्तव्य अनंत हैं। हरेक तरह के कर्तव्य का अलग-अलग नाम होता है तो फिर धर्म को कोई एक नाम कैसे दिया जा सकता है???हमारे ग्रन्थों में तो हर जगह धर्म के नाम पर कर्तव्य की ही बात की गई है;पूजा-पाठ की नहीं, फिर लोग इतने भटक कैसे गए!!!?। जैसे-सीता जी पर जब सारी प्रजा संदेह करने लगे और उसे त्यागने की बात करने लगे तो राम जी अपने गुरु वशिष्ठ जी के पास गए और उनसे पूछते हैं कि उनका धर्म क्या है? वो अपना राजा होने का धर्म निभाएँ या पति होने का। कुछ लोग राम जी पर एक अयोग्य और अन्यायी पति होने का दोष देते हैं पर वे यह नहीं जानते कि उस समय उनके लिए राज्य-धर्म, पत्नी धर्म से बढ़कर था जिसे निभाना पड़ा उन्हें। जो सीता उन्हें प्राणों से भी प्रिय थी उसे धर्म की खातिर त्यागना पड़ा उन्हें।

दूसरा सबसे अच्छा उदाहरण देखिए---अर्जुन को जब अपनों का मोह होता है तो वो युद्ध छोडकर सन्यास धारण करने की बात करता है। अब जरा सोचिए कि जो व्यक्ति राज्यसुख त्यागकर भिक्षा मांगकर साधु-सन्यासी बनना चाहता है तो ये बात तो धर्म के अंतर्गत आनी चाहिए पर उल्टे ये बात अधर्म और पाप बन जाता है उस समय। तब अर्जुन कहते हैं कि- हे केशव! बताईए कि इस समय मेरा धर्म क्या है?तब कृष्ण जी कहते हैं कि क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना है। लोग सोचते हैं कि तपस्वी बनना सबसे बड़ा पुण्य का काम है और हिंसा करना पाप, का पर यहाँ तो बात बिलकुल उल्टी है। इसलिए धर्म को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। इसी कारण हमारे भारत-वर्ष में धर्म का कोई नाम नहीं था। इसे नाम तो अज्ञानी विदेशियों ने दिया। जरा सोचिए कि जिस भारत ने पूरी दुनिया का नामकरण किया उसने अपने धर्म को कोई नाम क्यों नहीं दिया था?? 


सिंधु किनारे बसने के कारण भारतीयों को वे लोग हिन्दू कहने लगे और भारतीयों के हरेक कर्म को उनहोने एक हिन्दू-धर्म का नाम दे दिया। इस्लाम धर्म सिर्फ कुरान और मुहम्मद तक ही सीमित है। ईसाई के अनुसार सिर्फ बाईबिल में विश्वास कर लिया तो स्वर्ग और नहीं किया तो नरक। यानि बस एक बाइबल पर विश्वास करके धर्म का काम कर लो बाँकी चोरी-डकैती लूट-पाट जो करना है करते रहो, सब सही है। इस्लाम के अनुसार भी धर्म बस मुहम्मद और कुरान पर विश्वास करना ही है। यानि कुरान पर विश्वास करके तो धर्म का काम पूरा हो ही गया। अब तो कुछ बचा नहीं इसलिए अपनी बिरादरी को बढ़ाने के लिए चोरी-बलात्कार, हिंसा आदि करते रहो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। चूंकि इनलोगों का धर्म बाइबिल या कुरान तक ही सीमित था इसलिए अपनी अत्यंत छोटी बुद्धि का परिचय देते हुए इनहोंने मानव-धर्म को पूजा-पाठ करने तक सीमित करके उसे हिन्दू धर्म का नाम दे दिया, और दुख इस बात का है कि अब तक भारतीय अंग्रेजों और मुसलमानों की उसी छोटी बुद्धि में जकड़े हुए है।

मैं यह बात फिर से कह रहा हूँ कि धर्म को ना तो कोई पुस्तक तक सीमित किया जा सकता है ना ही कोई नाम दिया सकता है। धार्मिक पुस्तकें बस मार्गदशन कर सकती हैं। कुरान-बाइबिल जैसी एक-दो की बात तो क्या हजार पुस्तकों में भी धर्म को नहीं बांधा जा सकता। धर्म को अगर बांधा जा सकता है तो भावनाओं में। अच्छी और परोपकारी भावना धर्म तथा दूसरों को क्षति पहुंचाने वाली भावना अधर्म। कहा जाता है कि जब व्यास ने 18 पुराणों की रचना की और नारद को उसे लोगों तक पहुंचाने का जिम्मा सौंपा तो नारद जी ने इतनी सारी पुस्तकें पढ़ने से मना कर दिया और उसका सार पूछ लिया। तो व्यास जी ने कहा कि परोपकार करना धर्म है, पुण्य है और दूसरों को किसी प्रकार हानि पहुंचाना अधर्म या पाप है, बस यही इन पुस्तकों का सार है।

निस्वार्थ कर्म करना धर्म है जो मोक्ष देने वाला होता है। अपने कर्त्तव्य को बिना अपने लाभ-हानि की चिंता किए निभाना ही धर्म है। अपने कर्तव्य को बिलकुल निःस्वार्थ भाव से करना यानि की उस कर्म में मोक्ष प्राप्ति का भी स्वार्थ नहीं होना चाहिए। कर्म बिलकुल निःस्वार्थ होना चाहिए। जैसे कि भीष्म जी ने किया था। जीवन भर निःस्वार्थ होकर सारे दुःख दूसरों के लिए सहते रहे और मोक्ष को प्राप्त हुए। उन्होंने जो किया वो एक कठिन तपस्या से कम नहीं था।

जरा सोचिए आज भारत में इतना भ्रष्टाचार क्यों है? स्वार्थ की वजह से ही ना? अगर सब धर्म का सही अर्थ समझ लें और निःस्वार्थ होकर अपना कर्त्तव्य निभाने लगें तो क्या ये भारत स्वर्ग नहीं बन जाएगा?

सारे धर्मों में राष्ट्र-धर्म सबसे बड़ा धर्म होता है। कितना अच्छा होता कि भारत में सबका एक ही धर्म होता राष्ट्र-धर्म यानि भारत-धर्म। एक ही जाती होती भारतीय जाति। एक देश,एक धर्म,एक जाति। सारा झगड़ा ही खत्म हो जाता।

कोई ना कोई कर्म ही धर्म या अधर्म कहलाता है, और हिन्दू किसी प्रकार का कोई कर्म नहीं है इसलिए हिन्दू कोई धर्म नहीं है। हिन्दू तो भारत में रहने वाले लोग हैं। यानि हिन्दू का अर्थ भारतीय है। भारत के रहने वाले सारे लोग हिन्दू कहलाने चाहिए ना कि मूर्ति-पूजक लोग। इस सिद्धान्त से भारत में रहने वाले लोग चाहे वो मुसलमान हों या ईसाई हों सबको हिंदु की संज्ञा देनी चाहिए, और उन्हें हिंदु कहकर ही संबोधित करना चाहिए। चूंकि मेरे अनुसार तो धर्म का कोई नाम नहीं हो सकता है, इसलिए मुसलमान या ईसाई भी मेरे लिए कोई धर्म नहीं है एक संप्रदाय है। और हिंदु वो संप्रदाय है जो भारतीयों की सभ्यता-संस्कृति का प्रतीक है। हम हिंदुओं को अपने आपको एक भारतीय समझना चाहिए ना कि हिंदु धर्म वाले लोग। 


विदेशी तो हम भारतीय को अलग-अलग धर्म-संप्रदाय में बांटेंगे ही पर ये हम लोगों का कर्तव्य है कि हम अपने आपको ना भूलें। अपने आपको पहचानना हमारा अपना कर्तव्य है। भारत की सारी परंपरा, हर तरह के रीति-रिवाज, कर्म-काण्ड, सोच-विचार, चाल-ढाल पहनावा-ओढ़ावा सब एक हिंदु में समाहित होता है। एक हिंदु ही भारत का प्रतिनिधित्व करता है, कोई मुसलमान या ईसाई नहीं। मुसलमान अरब देश का प्रतिनिधित्व करता है, और ईसाई पश्चिमी देशों का। हिंदु और भारतीय दोनों शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं। हिंदु यानि भारतीय। धर्म के नाम पर लोगों को मुसलमानों ने और ईसाईयों ने बाँटा। उसके बाद भारत देश को हिंदु के बदले धर्म-निरपेक्ष देश कहकर गांधी ने बाँटा। कोई भी कर्म या तो धर्म होता है या अधर्म। धर्म-निरपेक्ष का कोई अर्थ नहीं है। आपने चोरी की तो अधर्म या ना किया तो धर्म।

फिर धर्म-निरपेक्ष का मतलब क्या???धर्म के बाद सिर्फ अधर्म ही बचा रहता है। धर्म-निरपेक्ष अधर्म का ही पर्याय है। धर्म-निरपेक्ष शब्द धर्म को जबर्दस्ती घुसेड़ देता है समाज में, क्योंकि निरपेक्षता की बात तब आती है जब धर्म की बात की जाएगी। यानि जब भी धर्म की बात आएगी तभी धर्म-निरपेक्षता की बात आएगी और इस धर्म-निरपेक्ष में धर्म किसी कर्म का प्रतिनिधित्व ना करके हिंदु, मुसलमान और ईसाई आदि संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानि धर्म-निरपेक्ष शब्द लोगों को हिंदु-मुसलमान आदि संप्रदायों में बांटते हैं। इस सिद्धान्त से धर्म-निरपेक्ष का नारा लगाने वाले सब मूर्ख हैं, अधार्मिक अर्थात पापी हैं और देश को तोड़ने वाले देश-द्रोही हैं। अतः धर्म-निरपेक्षता का नारा लगाने वाले देश के दुश्मनों को कटघरे में खड़ा कर देना चाहिए। भारत धर्म-निरपेक्ष की बजाय एक धार्मिक देश होता तो धर्म के नाम पर इतनी हिसा ना हुई होती।

अंत में मैं सबसे यही कहना चाहूँगा कि विदेशी जिसे भी धर्म का नाम दें या जिस चीज को भी हिंदु धर्म समझें पर आप जरूर समझने का प्रयास करिए कि धर्म क्या है। पूजा-पाठ,ध्यान-साधना,ईश-भक्ति आदि धर्म का एक हिस्सा है धर्म नहीं।
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Sunday, June 17, 2012

वेदों में नारी का महत्व



वेदों में नारी का महत्व..

वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं| वेदों में
स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य किसी धर्मग्रंथ में नहीं है| वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं और देश की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं|

वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय| वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख – समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा- जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं|

वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है – उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है| वैदिक काल में नारी अध्यन- अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र में भी जाती थी| जैसे कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी| कन्या को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार देकर वेद पुरुष से एक कदम आगे ही रखते हैं|

अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि |

तथापि, जिन्होनें वेदों के दर्शन भी नहीं किए, ऐसे कुछ रीढ़ की हड्डी विहीन बुद्धिवादियों ने इस देश की सभ्यता, संस्कृति को नष्ट – भ्रष्ट करने का जो अभियान चला रखा है – उसके तहत वेदों में नारी की अवमानना का ढ़ोल पीटते रहते हैं |

आइए, वेदों में नारी के स्वरुप की झलक इन मंत्रों में देखें -

यजुर्वेद २०.९
स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है |

यजुर्वेद १७.४५
स्त्रियों की भी सेना हो | स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें |

यजुर्वेद १०.२६
शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें | जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों |

अथर्ववेद ११.५.१८
ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है | यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है |
कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें |

अथर्ववेद १४.१.६
माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें | वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें |
जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने – कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे |

अथर्ववेद १४.१.२०
हे पत्नी ! हमें ज्ञान का उपदेश कर |
वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे |

अथर्ववेद ७.४६.३
पति को संपत्ति कमाने के तरीके बता |
संतानों को पालने वाली, निश्चित ज्ञान वाली, सह्त्रों स्तुति वाली और चारों ओर प्रभाव डालने वाली स्त्री, तुम ऐश्वर्य पाती हो | हे सुयोग्य पति की पत्नी, अपने पति को संपत्ति के लिए आगे बढ़ाओ |

अथर्ववेद ७.४७.१
हे स्त्री ! तुम सभी कर्मों को जानती हो |
हे स्त्री ! तुम हमें ऐश्वर्य और समृद्धि दो |

अथर्ववेद ७.४७.२
तुम सब कुछ जानने वाली हमें धन – धान्य से समर्थ कर दो |
हे स्त्री ! तुम हमारे धन और समृद्धि को बढ़ाओ |

अथर्ववेद ७.४८.२
तुम हमें बुद्धि से धन दो |
विदुषी, सम्माननीय, विचारशील, प्रसन्नचित्त पत्नी संपत्ति की रक्षा और वृद्धि करती है और घर में सुख़ लाती है |

अथर्ववेद १४.१.६४
हे स्त्री ! तुम हमारे घर की प्रत्येक दिशा में ब्रह्म अर्थात् वैदिक ज्ञान का प्रयोग करो |
हे वधू ! विद्वानों के घर में पहुंच कर कल्याणकारिणी और सुखदायिनी होकर तुम विराजमान हो |

अथर्ववेद २.३६.५
हे वधू ! तुम ऐश्वर्य की नौका पर चढ़ो और अपने पति को जो कि तुमने स्वयं पसंद किया है, संसार – सागर के पार पहुंचा दो |
हे वधू ! ऐश्वर्य कि अटूट नाव पर चढ़ और अपने पति को सफ़लता के तट पर ले चल |

अथर्ववेद १.१४.३
हे वर ! यह वधू तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है |
हे वर ! यह कन्या तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है | यह बहुत काल तक तुम्हारे घर में निवास करे और बुद्धिमत्ता के बीज बोये |

अथर्ववेद २.३६.३
यह वधू पति के घर जा कर रानी बने और वहां प्रकाशित हो |

अथर्ववेद ११.१.१७
ये स्त्रियां शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय ( यज्ञ समान पूजनीय ) हैं, ये प्रजा, पशु और अन्न देतीं हैं |
यह स्त्रियां शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विद्वत्तापूर्ण हैं | यह समाज को प्रजा, पशु और सुख़ पहुँचाती हैं |

अथर्ववेद १२.१.२५
हे मातृभूमि ! कन्याओं में जो तेज होता है, वह हमें दो |
स्त्रियों में जो सेवनीय ऐश्वर्य और कांति है, हे भूमि ! उस के साथ हमें भी मिला |

अथर्ववेद १२.२.३१
स्त्रियां कभी दुख से रोयें नहीं, इन्हें निरोग रखा जाए और रत्न, आभूषण इत्यादि पहनने को दिए जाएं |

अथर्ववेद १४.१.२०
हे वधू ! तुम पति के घर में जा कर गृहपत्नी और सब को वश में रखने वाली बनों |

अथर्ववेद १४.१.५०
हे पत्नी ! अपने सौभाग्य के लिए मैं तेरा हाथ पकड़ता हूं |

अथर्ववेद १४.२ .२६
हे वधू ! तुम कल्याण करने वाली हो और घरों को उद्देश्य तक पहुंचाने वाली हो |

अथर्ववेद १४.२.७१
हे पत्नी ! मैं ज्ञानवान हूं तू भी ज्ञानवती है, मैं सामवेद हूं तो तू ऋग्वेद है |

अथर्ववेद १४.२.७४
यह वधू विराट अर्थात् चमकने वाली है, इस ने सब को जीत लिया है |
यह वधू बड़े ऐश्वर्य वाली और पुरुषार्थिनी हो |

अथर्ववेद ७.३८.४ और १२.३.५२
सभा और समिति में जा कर स्त्रियां भाग लें और अपने विचार प्रकट करें |

ऋग्वेद १०.८५.७
माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्याबल उपहार में दें | माता- पिता को चाहिए कि वे अपनी कन्या को दहेज़ भी दें तो वह ज्ञान का दहेज़ हो |

ऋग्वेद ३.३१.१
पुत्रों की ही भांति पुत्री भी अपने पिता की संपत्ति में समान रूप से उत्तराधिकारी है |

ऋग्वेद १० .१ .५९
एक गृहपत्नी प्रात : काल उठते ही अपने उद् गार कहती है -
” यह सूर्य उदय हुआ है, इस के साथ ही मेरा सौभाग्य भी ऊँचा चढ़ निकला है | मैं अपने घर और समाज की ध्वजा हूं , उस की मस्तक हूं | मैं भारी व्यख्यात्री हूं | मेरे पुत्र शत्रु -विजयी हैं | मेरी पुत्री संसार में चमकती है | मैं स्वयं दुश्मनों को जीतने वाली हूं | मेरे पति का असीम यश है | मैंने वह त्याग किया है जिससे इन्द्र (सम्राट ) विजय पता है | मुझेभी विजय मिली है | मैंने अपने शत्रु नि:शेष कर दिए हैं | ”
वह सूर्य ऊपर आ गया है और मेरा सौभाग्य भी ऊँचा हो गया है | मैं जानती हूं , अपने प्रतिस्पर्धियों को जीतकर मैंने पति के प्रेम को फ़िर से पा लिया है |
मैं प्रतीक हूं , मैं शिर हूं , मैं सबसे प्रमुख हूं और अब मैं कहती हूं कि मेरी इच्छा के अनुसार ही मेरा पति आचरण करे | प्रतिस्पर्धी मेरा कोई नहीं है |
मेरे पुत्र मेरे शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं , मेरी पुत्री रानी है , मैं विजयशील हूं | मेरे और मेरे पति के प्रेम की व्यापक प्रसिद्धि है |

ओ प्रबुद्ध ! मैंने उस अर्ध्य को अर्पण किया है , जो सबसे अधिक उदाहरणीय है और इस तरह मैं सबसे अधिक प्रसिद्ध और सामर्थ्यवान हो गई हूं | मैंने स्वयं को अपने प्रतिस्पर्धियों से मुक्त कर लिया है |
मैं प्रतिस्पर्धियों से मुक्त हो कर, अब प्रतिस्पर्धियों की विध्वंसक हूं और विजेता हूं | मैंने दूसरों का वैभव ऐसे हर लिया है जैसे की वह न टिक पाने वाले कमजोर बांध हों | मैंने मेरे प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त कर ली है | जिससे मैं इस नायक और उस की प्रजा पर यथेष्ट शासन चला सकती हूं |
इस मंत्र की ऋषिका और देवता दोनों हो शची हैं | शची इन्द्राणी है, शची स्वयं में राज्य की सम्राज्ञी है ( जैसे कि कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष हो ) | उस के पुत्र – पुत्री भी राज्य के लिए समर्पित हैं |

ऋग्वेद १.१६४.४१
ऐसे निर्मल मन वाली स्त्री जिसका मन एक पारदर्शी स्फटिक जैसे परिशुद्ध जल की तरह हो वह एक वेद, दो वेद या चार वेद , आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद , अर्थवेद इत्यादि के साथ ही छ : वेदांगों – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद : को प्राप्त करे और इस वैविध्यपूर्ण ज्ञान को अन्यों को भी दे |
हे स्त्री पुरुषों ! जो एक वेद का अभ्यास करने वाली वा दो वेद जिसने अभ्यास किए वा चार वेदों की पढ़ने वाली वा चार वेद और चार उपवेदों की शिक्षा से युक्त वा चार वेद, चार उपवेद और व्याकरण आदि शिक्षा युक्त, अतिशय कर के विद्याओं में प्रसिद्ध होती और असंख्यात अक्षरों वाली होती हुई सब से उत्तम, आकाश के समान व्याप्त निश्चल परमात्मा के निमित्त प्रयत्न करती है और गौ स्वर्ण युक्त विदुषी स्त्रियों को शब्द कराती अर्थात् जल के समान निर्मल वचनों को छांटती अर्थात् अविद्यादी दोषों को अलग करती हुई वह संसार के लिए अत्यंत सुख करने वाली होती है |

ऋग्वेद १०.८५.४६
स्त्री को परिवार और पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका में चित्रित किया गया है | इसी तरह, वेद स्त्री की सामाजिक, प्रशासकीय और राष्ट्र की सम्राज्ञी के रूप का वर्णन भी करते हैं |

ऋग्वेद के कई सूक्त उषा का देवता के रूप में वर्णन करते हैं और इस उषा को एक आदर्श स्त्री के रूप में माना गया है | कृपया पं श्रीपाद दामोदर सातवलेकर द्वारा लिखित ” उषा देवता “, ऋग्वेद का सुबोध भाष्य देखें |
सारांश (पृ १२१ – १४७ ) -
१. स्त्रियां वीर हों | ( पृ १२२, १२८)
२. स्त्रियां सुविज्ञ हों | ( पृ १२२)
३. स्त्रियां यशस्वी हों | (पृ १२३)
४. स्त्रियां रथ पर सवारी करें | ( पृ १२३)
५. स्त्रियां विदुषी हों | ( पृ १२३)
६. स्त्रियां संपदा शाली और धनाढ्य हों | ( पृ १२५)
७.स्त्रियां बुद्धिमती और ज्ञानवती हों | ( पृ १२६)
८. स्त्रियां परिवार ,समाज की रक्षक हों और सेना में जाएं | (पृ १३४, १३६ )
९. स्त्रियां तेजोमयी हों | ( पृ १३७)
१०.स्त्रियां धन-धान्य और वैभव देने वाली हों | ( पृ १४१-१४६)
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