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Thursday, July 19, 2018

जो हम दुसरो को देंगे वहीं लौट कर आयेगा

moral stories, adhyatmik kahaniya
गाँव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था.

एक दिन बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया वो उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ रवाना हुवा. वो मक्खन गोल पेढ़ो की शकल मे बना हुआ था और हर पेढ़े का वज़न एक kg था.

शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया और दुकानदार से चायपत्ती, चीनी, तेल और साबुन वगैरह खरीदकर वापस अपने गाँव को रवाना हो गया..

किसान के जाने के बाद -
दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज़र मे रखना शुरू किया... उसे खयाल आया के क्यूँ ना एक पेढ़े का वज़न किया जाए, वज़न करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 gm.का निकला, हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 gm.के ही निकले।

अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा.
दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा: दफा हो जा, किसी बे-ईमान और धोखेबाज़ शख्स से कारोबार करना. पर मुझसे नही।

900 gm.मक्खन को पूरा एक kg.कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नही करता..
किसान ने बड़ी ही "विनम्रता" से दुकानदार से कहा "मेरे भाई मुझसे नाराज ना हो हम तो गरीब और बेचारे लोग है,
हमारी माल तोलने के लिए बाट (वज़न) खरीदने की हैसियत कहाँ" आपसे जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूँ उसी को तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर दूसरे पलड़े मे उतने ही वज़न का मक्खन तोलकर ले आता हूँ।

जो हम दुसरो को देंगे,वहीं लौट कर आयेगा...

चाहे वो इज्जत, सम्मान हो,या फिर धोखा...!!
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Friday, January 22, 2016

Gyan Ka Deepak

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ज्ञान का दीपक

एक संत गंगा किनारे आश्रम में रहकर शिष्यों को पढ़ाते थे। एक दिन उन्होंने रात होते ही अपने एक शिष्य को एक पुस्तक दी व बोले, ‘‘इसे अंदर जाकर मेरे तख्त पर रख आओ।''

शिष्य पुस्तक लेकर लौट आया तथा कांपते हुए बताया, ‘‘गुरुदेव, तख्त के पास तो सांप है।''

संत जी ने कहा, ‘‘तुम फिर से अंदर जाओ। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करना, सांप भाग जाएगा।''

शिष्य फिर अंदर गया, उसने मंत्र का जाप किया, उसने देखा कि काला सांप वहीं है। वह फिर डरते-डरते लौट आया। अब गुरुदेव ने कहा, ‘‘वत्स ! इस बार तुम दीपक हाथ में लेकर जाओ। सांप दीपक के प्रकाश से डरकर भाग जाएगा।''

छात्र दीपक लेकर अंदर पहुंचा, तो प्रकाश में उसने देखा कि वह सांप नहीं रस्सी का टुकड़ा था। अंधकार के कारण उसे सांप दिखाई दे रहा था।

संत जी को जब उसने रस्सी होने की बात बताई, तो वे मुस्कराकर बोले, ‘‘वत्स, संसार गहन भ्रमजाल का नाम है। ज्ञान के प्रकाश से ही इस भ्रमजाल को काटा जा सकता है। अज्ञानतावश ही हम बहुत से भ्रम पाल लेते हैं। उन्हें दूर करने के लिए हमेशा ज्ञानरूपी दीपक का सहारा लेना चाहिए।"
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